पुलिस को रस्सी का सांप
बनाते तो सुना होगा आपने,
लेकिन दिल्ली पुलिस ने तो उससे भी आगे जाकर और भी बड़ा कमाल कर दिया
कि वह सपेरे को ही सांप साबित कर रही है। रस्सी और सांप में कुछ चीजे एक जैसी होती
हैं । जैसे सांप भी रस्सी की तरह लम्बा होता है। दूसरे जिस तरह से सांप मुड़ सकता
है ठीक उसी तरह से रस्सी को भी मोड़ कर रखा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि
सांप जीव है और रस्सी निर्जीव। पुलिस की इस तरह की कार्यशैली को लोग हजम करने के
आदी भी हो गए थे। लेकिन दिल्ली पुलिस ने एक और कमाल कर दिया उसने सांप जैसे दिखने
वाले नहीं बल्कि उससे बिलकुल भिन्न सपेरे (इंसान) को ही सांप साबित कर दिया।
जवाहर लाल विश्विद्यालय
में गुंडों द्वारा किया गए हमले में दिल्ली पुलिस गुंडों को तो नहीं पकड़ सकी, लेकिन जो
लोग गुंडों के हमलों के शिकार हुए उन्ही को गुंडा साबित करने में जुट गयी। जिनके
सिर फटे, जिनको
चोटें आई वही हमलावर बना दिए गए। कमाल है दिल्ली पुलिस। लेकिन पुलिस की यह कहानी
देश को हज़म नहीं हो रही है। और जनता खुलकर नारा लगा रही है कि ये जो दहशतगर्दी है
इसके पीछे वर्दी है।
मुझे अपने क्राइम
रिपोर्टिंग के दौर की एक घटना याद आ रही है। जिसमे चोरी की रिपोर्ट लिखवाने वाले को ही पुलिस ने चोरी के इल्जाम में हिरासत
में ले लिया था। घटना उत्तर प्रदेश की थी।
थाने में एक व्यक्ति पुलिस के पास चोरी की रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंचा।
जैसा की आपको पता है कि थाने वाले जल्दी अपराध को दर्ज नहीं करते, क्योंकि
थाने का रिकार्ड खराब होता है। इसलिए पीड़ित को इतना परेशां कर दो की वह खुद ही
बिना रिपोर्ट लिखाये थाने से चला जाए।
लेकिन यहां शिकायतकर्ता पुलिस को अपना रक्षक मान कर वहीं बैठा रहा। जब बार
बार शिकायतकर्ता शिकायत दर्ज करने का आग्रह करता रहा तो पुलिस वालों ने शाम को उसी
चोरी के आरोप में उसे ही हवालात में डाल दिया। अब शिकायतकर्ता की मुसीबत और बढ़ गई।
इस बीच किसी तरह से उसके एक परिचित थाने में उसकी खैर खबर लेने पहुँच गए। वहां
अपने परिचित को ही सलाखों के पीछे देखा। तब हवालात से बाहर का रास्ता वहां मौजूद
पुलिस वाले से पूंछा तो उसने दान दक्षिणा की बात की। मरता क्या न करता की कहावत को
चरितार्थ करते हुए उसने अपने परिचित को छुड़ाने के लिए मांगी गई धनराशि उपलब्ध करा
दी। उस रिश्वत की धनराशि को पुलिस ने चोरी
की रकम बरामदगी में दिखला दी।
अब शिकायतकर्ता और परिचित
दोनों के लिए मुसीबत दोगुनी हो गई। तब उस सज्जन ने मुझसे संपर्क किया। इस बाबत जब उन पुलिस वालों से जानकारी ली गयी
तो उन्होंने कहा कि हम कोई भगवान् तो हैं
नहीं की चोर को पकड़ लें। इसलिए हम चोरी दर्ज ही नहीं करते। अगर दर्ज कर
लेंगे तो आप लोग दबाव बनाओंगे की चोर क्यों नहीं पकड़ रहे। इसलिए चोर भी पकड़ा गया
और माल भी बरामद,
कागजी खानापूर्ति हो गई। यह सारा ड्रामा देखकर आला अधिकारीयों से
संपर्क किया। तब जाकर शिकायतकर्ता को राहत मिली।
कुछ इसी तरह से दिल्ली
पुलिस भी कहानी बना रही है। और सपेरे को ही सांप साबित करने में लग रही है। और
उसने जैसे सबके सामने आकर झूठ दर्शाया है उससे उसकी छवि और कार्यशैली से लोगों का
विश्वास उठा है हां आखिर में एक बात जरूर कहना चाहता हूँ कि सारे पुलिस वालों की इस
तरह की मानसिकता नहीं होती है। उन पर काफी दबाव भी होता है। इस मामले में भी हो
सकता है दबाव काम कर रहा हो। लेकिन उन्हें क़ानून और संविधान का उल्लंघन कदापि नहीं
करना चाहिए। जिसकी रक्षा के लिए वह शपथ लेकर अपने पद पर आते हैं।
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